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फसाना ए बेकरार दिल

                
                                                         
                            ये नहीं कि इशारे तेरे मैं नहीं समझता कुछ तो समझ लेता हूं सच ये इशारे सारे तेरे मैं समझ नहीं पाया
                                                                 
                            
कोई रात ऐसी नहीं कि चैन से सो पाया करके तुमसे गुफ्तगू ख्वाब में इरादे सारे तेरे मैं समझ नहीं पाया
मिल कर तुमसे मैं अभी घर लौटा हूं वक्त ए रुखसत जताया बेरुखी मुझ पे इरादे तेरे मैं समझ नहीं पाया
ये जो आगे पीछे हैं तुम्हें दिल दे बैठे करीब से सबको जानता हूं मगर सितम ये कि तुझे समझ नहीं पाया
तुझे समझना भी मेरी समझ से बाहर है करूं क्या खुद से है शिकायत कि गुबार ए गम समझ नहीं पाया
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3 महीने पहले

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