देख कर धूप कड़ी हम बचा कर सर अपना सामने तेरे दर के साया ए दीवार में शाम के आसार में आ बैठे हैं
यहां सिवा तेरे किसी और से मैं वाकिफ नहीं तू न मिला तो इंतजार में हम ही खुद से उकता कर आ बैठे हैं
है कड़ी धूप का घेरा इंतजार शाम का कर रहा हूं भाती नही ये कड़ी धूप हम तेरे दीदार के इंतजार में बैठे हैं
निकला था मैं कड़ी धूप में तुझको ढूंढने खातिर कितने गम समेट रखे छुपा कर ज़माने से हम कहने बैठे हैं
सितम ये तू भी न मिला हमें अभी तक भांप कर अपने चेहरे में उड़ा रंगत मिटा कर लुफ्त ए ताल्लुक बैठे हैं
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