वो माँ का चूल्हा भी कुछ-कुछ माँ-सा बूढ़ा हो चला है,
अब वो भी धीरे धीरे मां जैसे ही,
अपनी स्मृति पटल के धुंधली तस्वीरों में खो चला है,
वो माँ का चूल्हा भी कुछ कुछ मां सा बूढ़ा हो चला है ।
अब उसके चेहरे पर भी झुर्रियों की चादरें दिखने लगी हैं
जगह जगह उसकी मिट्टी भी अब
धीरे-धीरे दरकने लगी है
अब तो टूट चुका चूल्हे का गोट है
और जगह-जगह से पपड़ियाँ भी झड़ने लगी हैं
वो लटकती मिट्टी की परतें,
और उसके उखड़े आड़े टेढ़े उभार,
अनायास ही माँ की झुर्रियों वाले चेहरे की
यादों में मुझको ले चला है,
वो माँ का चूल्हा भी कुछ कुछ माँ सा बूढ़ा हो चला है।
गोबर की लिपाई से मां का उसको सजाना
और नरम मिट्टी से माँ का उसकी दरारों को भरना,
लिपाई की सोंधी सोंधी खुशबू से महकता वो चूल्हा,
ज्यों माँ का संवारा स्नेहिल वो नन्हे बच्चे-सा चूल्हा।
अब न वो गोबर, न मिट्टी की लिपाई के वे लम्हे हैं,
अब तो वो चूल्हा भी तन्हा बुढ़े सा,
खुद को यादों में खोजता चला है।
वो माँ का चूल्हा भी कुछ कुछ मां सा बूढ़ा हो चला है।
वो कोयलो और लकड़ियों का धीरे-धीरे सुलगना,
वो फूँकनी की फूँकों से राख के बादलों का उड़ना,
वो जलने से पहले धुएँ का गुबार निकलना,
वो माँ संग सुबह से देर रात तलक जलना।
अब न वो राख, न धुएं का गुबार बचा है,
अब तो फूंकनी का फूं-फूं शोर भी थम-सा गया है,
जलता नहीं पहले सा दिन भर अब वो चूल्हा,
अब तो लगभग शून्य सा हो चला है।
वो माँ का चूल्हा भी कुछ-कुछ माँ-सा बूढ़ा हो चला है।
वो चूल्हा जो सारे बर्तन काले काले करता था,
पर उसकी कालिख में हरदम मां का स्नेह छलकता था
सुबह सुबह लग जाते थे दोनों
सब कुछ बन जाता था,
और चूल्हे के स्वादिष्ट भोजन से
हम सबका पेट भरता था
अब वो चूल्हे में पकी रोटियां
और मां के हाथों का स्नेह स्वाद,
सब गुज़रा ज़माना बन चला है।
वो माँ का चूल्हा भी कुछ-कुछ माँ-सा बूढ़ा हो चला है
वो माँ का चूल्हा भी कुछ कुछ मां सा बूढ़ा हो चला है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X