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शीर्षक: "प्रशान्त की कलम"

                
                                                         
                            शीर्षक: "प्रशान्त की कलम"
                                                                 
                            

मेरा नाम है प्रशान्त, पर ख़ामोश नहीं हूँ मैं,
सच की राह का चलता हुआ एक कारवाँ हूँ मैं।

झुककर कभी ज़मीर का सौदा नहीं किया,
आँधियों में भी अपने इरादों को कम नहीं किया।

लफ़्ज़ मेरे तलवार नहीं, आईना बन जाते हैं,
झूठ के चेहरे खुद-ब-खुद बेनक़ाब हो जाते हैं।

नफ़रत की आग में नहीं, प्रेम के दीप जलाता हूँ,
अपनी मिट्टी, अपने वतन का गीत सुनाता हूँ।

मंज़िल मिले न मिले, सफ़र नहीं रुकने दूँगा,
सच और इंसानियत का परचम सदा उठने दूँगा।

जब भी मंच पर मेरा नाम "प्रशान्त" पुकारा जाएगा,
यक़ीन मानिए, हर दिल से बस एक ही स्वर आएगा—

"जो सच की राह दिखा दे, वही असली इंसान है,
उसका नाम ही नहीं, उसका किरदार भी प्रशान्त है।"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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