मत पूछो कैसी विपदा आई,
कैसी यह अंधियारी रात।
बाढ़ बनी मौत की धारा,
छीन गई जीवन की हर बात।
माँ की गोद हुई है सूनी,
बेटा आँखें मूँद गया।
पिता की उम्मीदों का सूरज,
लहरों में ही डूब गया।
कहीं बहन का भाई बिछड़ा,
कहीं उजड़ गया पूरा संसार।
टूट गए सपनों के महल सब,
रोता है असम बार-बार।
कच्चे घर मिट्टी हो बैठे,
आँगन बन गया श्मशान।
रोटी, कपड़ा, छत सब छूटा,
कैसा है यह क्रूर विधान!
बेजुबान पशु भी रोते हैं,
बहते हैं आँसू बनकर।
पंछी अपने घोंसले खो बैठे,
भटक रहे हैं दर-दर।
हे मानव! अब हाथ बढ़ाओ,
मत देखो जाति या धर्म।
दुखियों के आँसू पोंछो,
यही है सबसे बड़ा कर्म।
आओ मिलकर प्रण यह लें,
हर पीड़ित का साथ निभाएँगे।
फिर से हँसेगा प्यारा असम,
आशा के दीप जलाएँगे।
ईश्वर से बस यही प्रार्थना,
फिर ऐसा दिन न आए।
किसी माँ की सूनी गोद पर,
फिर कभी न बाढ़ मुस्काए।
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