खोल दो खिड़कियाँ,बंदिशें तोड़ दो,
खुद पे इतराने वाला जहाँ छोड़ दो,
आमना सामना सच का करने को हो,
तो सजावट भरा आशियाँ छोड़ दो।
हो दरख्तों के घनघोर छाया की माया,
रोशनी में नहाने की ज़िद ना करो,
काल के भाल की जो इबारत पढ़ो,
तो नज़रिया नज़र से ना ओझल करो।
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