समय भागता जाता आगे,
पीछे छूटा बचपन।
वो चंचलता, वो अपनापन,
बात-बात में रोना, हँसना,
पल में झगड़ा, पल में एका,
कहाँ गई सारी उत्सुकता?
पीछे छूटा बचपन।
बचपन की वो प्यारी बातें, लगे आज
अनजानी सी,
थोड़ी खट्टी, थोड़ी मीठी लगे आज
बेगानी सी।
मन की वो अनमोल धरोहर,
कुछ धुंधली सी, कुछ स्पष्ट सी,
लुप्त हो गई समय के साथ।
पीछे छूटा बचपन।
परछाईं की तरह ये यादें,
साथ उम्र भर चलती हैं,
पर समय चक्र तो आगे भागे।
पीछे छूटा बचपन।
— प्रमिला सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X