आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्रिय का कहूँ तोसे...सब भूली!

                
                                                         
                            अब कुछ ना सूझे सब शून्य विलग,
                                                                 
                            
प्रिय का कहूँ तोसे, सब भूली।

चितवन में लगे हैं दावानल,
अब हृदयायुध भी वार गई।
हे प्रेम शैल के प्रवर बिंद,
मैं स्नेह द्वंद्व तोसे हार गई।
नैनन तों मेरे जलसिंधु भरे,
कहो कैसे लखूं तोरी पग धूलि।
अब कुछ ना सूझे सब शून्य विलग,
प्रिय का कहूँ तोसे, सब भूली।

तोरे लट बिखरत मधु कुंजलता,
अँखियन घन जैसे रत्नाकर।
भृकुटि तन ज्यों हों धनुष चाप,
बंशी बन लागूँ तोरे अधर।
कहो आत्मसमर्पण कैसे करूँ,
करो माफ़ या के धर दो शूली।
अब कुछ ना सूझे सब शून्य विलग,
प्रिय का कहूँ तोसे, सब भूली।

मैं प्रणय निवेदन कैसे करूं,
है मौन मुखर चित्त गोधूली।
अब कुछ ना सूझे सब शून्य विलग,
प्रिय का कहूँ तोसे, सब भूली।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 सप्ताह पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर