अब कुछ ना सूझे सब शून्य विलग,
प्रिय का कहूँ तोसे, सब भूली।
चितवन में लगे हैं दावानल,
अब हृदयायुध भी वार गई।
हे प्रेम शैल के प्रवर बिंद,
मैं स्नेह द्वंद्व तोसे हार गई।
नैनन तों मेरे जलसिंधु भरे,
कहो कैसे लखूं तोरी पग धूलि।
अब कुछ ना सूझे सब शून्य विलग,
प्रिय का कहूँ तोसे, सब भूली।
तोरे लट बिखरत मधु कुंजलता,
अँखियन घन जैसे रत्नाकर।
भृकुटि तन ज्यों हों धनुष चाप,
बंशी बन लागूँ तोरे अधर।
कहो आत्मसमर्पण कैसे करूँ,
करो माफ़ या के धर दो शूली।
अब कुछ ना सूझे सब शून्य विलग,
प्रिय का कहूँ तोसे, सब भूली।
मैं प्रणय निवेदन कैसे करूं,
है मौन मुखर चित्त गोधूली।
अब कुछ ना सूझे सब शून्य विलग,
प्रिय का कहूँ तोसे, सब भूली।
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