कहानी है पुरानी
कि दौड़ में
खरगोश और कछुए की
जीता था कछुआ ही
क्योंकि आ गई थी
बीच रास्ते में नींद
खरगोश को
और मंथर मगर स्थिर चाल से
चलने वाले कछुए की
हो गई थी जीत
इस दौड़ में
वैसे, कहना है
जंतुओं के व्यवहार पर
शोध करने वाले
वैज्ञानिकों का
कि न तो जल्दी करते हैं
कछुए
और न ही वे
लेते हैं तनाव
किसी किस्म का
होती नहीं उन्हें
इस बात की कोई परवाह
कि कौन आगे है उनके
वे बस चलते रहते हैं निरंतर
बढ़ाते हुए एक-एक कदम
अपनी मंथर चाल से
और सबसे आश्चर्यजनक बात यह
कि शांति और घोर उथल-पुथल
दोनों ही स्थितियों में
पहुंच जाते हैं कछुए
हमेशा तट तक
इसलिए कीजिए पालन
कछुआ सिद्धांत का
है नहीं ज़रूरत भागना
खरगोश की तरह
तेज़ चाल से
क्योंकि होती नहीं तय प्रगति
केवल चाल से ही
बल्कि होती है तय यह
धैर्य से
मगर चलते रहिए आप
रुकिए नहीं
भूलिए नहीं
कि धीमी प्रगति भी
है आखिर प्रगति ही
तथा टिकती है शांति
तनाव से कहीं अधिक
समय तक।
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