रस्ता बदल गयी से।
मंजिल बदल गयी से।
प्रिय समाज आमरो,
भाषा वैभव कर बढ़ रही से।।
सोच बदल गयी से।
दृष्टि बदल गयी से।
प्रिय समाज आमरो,
साहित्य सृजन कर बढ़ रही से।।
समझ बदल गयी से।
विचार बदल गयी से।
प्रिय समाज आमरो,
इतिहास आपलो समझ रही से।।
चिन्तन बदल गयी से।
मनन बदल गयी से।
प्रिय समाज आमरो,
पहचान बचावन लड़ रहीं से।।
समाज हित समझ रहीं से।
साजिशों को विरोध कर रही से।
प्रिय समाज आमरो,
इतिहास बचावन लड़ रही से।।
राग बदल रहीं से।
अनुराग बदल रहीं से।
प्रिय समाज आमरो,
पोवार नाव पर गर्व कर रही से।।
दिशा बदल गयी से।
दशा बदल गयी से।
प्रिय समाज आमरो,
धरोहर बचावन संघर्ष कर रहीं से।।
-ओ सी पटले
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X