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सुबह का नजारा

                
                                                         
                            एक मखमली सी सुबहा में,
                                                                 
                            
चिड़ियों की चहचहाहट, सूरज की किरणे
पवन की आहट…
मुर्गे की कुकुडुकू और सूखे पत्तो की सरसराहट,
अब कहाँ होती है जी,
अब कहाँ होती है

माँ की चाय और दादी की पूजा,
पापा को हर दिन आया काम दूजा,
भाई की साइकिल और चेन का उतरना
दादाजी का हँसकर, उसे सही करना
अब कहाँ होता है, अब कहाँ होता है…

गुड़िया की शादी और गुड्डे को दूल्हा बनाना,
फिर नमक - मिर्ची की पानी में झुटमुट की सब्जी बनाना, ख़ुशी में नाचना और गीतों का गाना
अब कहाँ होता है जी अब कहाँ होता है…

अखबारों के रूपायन में दीदी का खो जाना,
फिर ढूँडकर रेसिपी, नए व्यंजन बनाना,
छोटी का भी अपनी माँ से चोटी कराना
माँ का उसको नई सीख, सिखाना
अब कहाँ होता है जी अब कहाँ होता है…

होता है क्या? बताना तो जरा
फिर से जी लूँ एक बार में वो दौर पुराना…
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2 महीने पहले

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