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मुसाफ़िर

                
                                                         
                            इस दिल की चाहत ऐसी है कि,मिल जाए वो सबकुछ जो लिखा हुआ है तक़दीर में,
                                                                 
                            
कहा ढूंढता फिरे मुसाफ़िर काफ़िरो की भीड़ में,
तू माने की रब मिलेगा एक दिन
जब तू साफ़ मन से जाएगा…

पर जाने कोन सा पत्थर तुझसे रास्ते में टकराएगा
क्या तू चल पाएगा आसानी से?
क्युकी राह ना तेरी आसाँ होगी
कहीं ऊबड़- खाबड़ रास्ते और कहीं तंग गालियाँ होंगी
कभी- कभी तो तुझको बिन हारे चलना होगा…
मिलेंगे ऐसे लोग भी जिन्हें तू ना पसंद होगा

क्या पता कोन खिंचे तुझे पीछे,
कैसा प्रलोभन आएगा
पर दृढ़ निश्चय हो तो
तुझे बेपरवाह चला जाएगा,
अपना पांव जमीं से आसमाँ में रखना होगा

क्या लेकर आया जग में जो तुझसे छीन जाएगा
तू बेपरवाह आया था एक दिन बेपरवाह होकर जाएगा
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3 महीने पहले

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