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बाबुल की चिंता

                
                                                         
                            आज बस यूँ ही बैठे हुए एक ख़याल मन में आ गया
                                                                 
                            
समय का पहिया जाने कैसे इतने आगे चला गया
अभी कल की ही तो बात है…
जब छम-छम करती लाडो रानी आँगन में दौड़ती थी
मीठी-मीठी बातें उसकी सबका मन मोह लेती थी…
माँ का आँचल छोड़कर जाने कब,
गुड़िया-गुड्डे,घोड़े-हाथी , घर -घर खेलना आ गया
फिर ना जाने कहाँ से कॉलेज का जमाना आ गया
बिटिया का साड़ी पहनना फेयरवेल में,बाबुल को चिंता करा गया
बाबुल सोचें…
मेरी लाडो बड़ी हुई ढूँड़ लू एक राजकुमार,
सौंप देनी होगी पूँजी उसको,
चाहिए बस बदले में करे जो मेरे जैसा इसको दुलार

बबूल के ब्रक्ष के नीचे बैठी माँ यादों को संजोती है
कुछ भी कह लो आख़िर, बेटियाँ तो पराई होती हैं…
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2 महीने पहले

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