पुनर्जन्म
हम अपने ही घर से निकाले गए थे
जब रची गई थी यह सृष्टि।
हमारे बिना सृष्टि की रचना अधूरी होती।
ईश्वर ने मांगा था हमें
कठोर तप कर के,
उस परम पिता परमात्मा से।
हमें उस गुनाह का दंड मिला
जो हमने कभी किया ही नहीं।
इस परदेश में रखा गया है किराए के मकान में हमें,
जैसे हरी पत्ती रहती है टहनी पर
बनाती हुई भोजन संपूर्ण वृक्ष के लिए।
मकान मालिक जाने कब खाली करा ले
यह किराए का मकान।
जैसे वृक्ष खाली करा लेते है टहनी
पत्तियों को विदा कर, नई कोपलों के स्वागत में।
हर सांस गिनकर मिली है हमें
और सांस का हिसाब देना होगा अंत में।
जैसे पिता देते है गिनकर जेब खर्ची
अपनी संतानों को।
हम मन के हाथों ठगे गए हैं
और यह ठगा जाना तय था।
काश! हम भी महामानव होते
सतयुग के,
लाख बरस पूरे कर लौट जाते अपने देश,
फिर कभी न लौटने को।
इस कभी न लौटने की खातिर हम लौटाए गए है
जन्म-जन्म, पुनर्जन्म
अलग-अलग रूपों में।
हर मनुष्य देव होना चाहता है
और हर देव मनुष्य।
मनुष्य होकर ही अंतिम धाम लौटा जा सकता है
कभी न लौटने को।
ईश्वर नहीं चाहते हमारा कभी न लौटना,
इसलिए ही वेद लिखे गए, कानून बने,
पाप-पुण्य, मोह-माया, सुख दुख में उलझाया गया ।
हमारा उलझना तय था।
हम कलयुग के मानव है
जितना उलझेंगे उतना ही टूटेंगे
और एक दिन
टूटी पतंग से गिर पड़ेंगे
औंधे मुँह जमीन पर,
यह जमीन हमें समेट लेगी।
हवा, पानी, अग्नि, आकाश
सब छीन लेंगे अपना-अपना हिस्सा
हमारी इस देह से।
और फिर किसी रोज लौटाए जाएंगे
इसी धरा को
जन्म -पुनर्जन्म ......।
~पूजा यादव
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