आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ज़िन्दगी बीती इंतिज़ार में

                
                                                         
                            ये ज़िंदगी है बीती तेरे इंतिज़ार में
                                                                 
                            
प्यासी रही है रूह मिरी एतिबार में

क्यों तोड़ दी है डोर मोहब्बत की तुमने ये
क्या मिल गया बता दे तू नफ़रत के वार में

जज़्बात समझे क्यूँ नहीं दिल के मेरे तू ने
ये ज़ेहन-ओ-क़ल्ब मेरे रहे डूबे प्यार में

तेरे विसाल के यकीं में जी रहे हैं हम
रहते हैं बेख़ुदी में तेरे ही ख़ुमार में

तुम बिन क़रार भी तो नहीं मिलता है हमें
रहता नहीं ये दिल भी मेरे इख़्तियार में
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
20 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर