ये ज़िंदगी है बीती तेरे इंतिज़ार में
प्यासी रही है रूह मिरी एतिबार में
क्यों तोड़ दी है डोर मोहब्बत की तुमने ये
क्या मिल गया बता दे तू नफ़रत के वार में
जज़्बात समझे क्यूँ नहीं दिल के मेरे तू ने
ये ज़ेहन-ओ-क़ल्ब मेरे रहे डूबे प्यार में
तेरे विसाल के यकीं में जी रहे हैं हम
रहते हैं बेख़ुदी में तेरे ही ख़ुमार में
तुम बिन क़रार भी तो नहीं मिलता है हमें
रहता नहीं ये दिल भी मेरे इख़्तियार में
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