ब्याह के सातों वचन दिल से निभाए हैं
ब्याह कर ही मोल इसका जान पाए हैं
घूमना फिरना ही तो होता नहीं जीवन
बोझ मिलकर ज़िन्दगी का हम उठाए हैं
है मिलन दो खानदानों का ये जीवन में
प्यारे गुल दोनों कुलों में ही खिलाए हैं
रूठना एवं मनाना प्यार का है रूप
रूठे हैं जब हम पिया हमको मनाए हैं
मुस्कुराहट ही सजाई है सदा होठों पे
प्यार के दीपक ही 'पारुल' ने जलाए हैं
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