रिश्तों के मायाजाल में बसती है ज़िंदगी
वैसे बहुत ही प्यारी सी लगती है ज़िंदगी
इसमें सुकून है तो, बहुत दर्द भी तो हैं
दिन-रात आग में ही सुलगती है ज़िंदगी
सुख-दुख तो ज़िंदगी का हैं हिस्सा, है सच यही
बनकर सवाब सी ही बरसती है ज़िंदगी
अपनी पसंद के सभी रिश्ते मिले किसे
रिश्तों में सबको ही सदा ठगती है ज़िंदगी
अपना लो दिल से रिश्तों को बख़्शे खुदा ने जो
बख़्शीश से ही उसकी महकती है ज़िंदगी
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