आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इश्क़ की नेमत

                
                                                         
                            नेमत मिली है इश्क़ की परवरदिगार से
                                                                 
                            
पछतावा हो न तुमको कभी अपने प्यार से

करना है ज़िंदगी का हमें साथ ही सफ़र
रहना हमें सँभल के ही नफ़रत के वार से

होता नहीं है इश्क का संबंध भी उम्र से
मुश्किल है बचना ज़िंदगी में इस ख़ुमार से

टूटे नही ये डोर मोहब्बत की यूँ कभी
तुम जोड़े रखना इसको सदा एतिबार से

क़ायम है इश्क़ दूरियों में भी हमेशा से
होता ये गहरा और सदा इंतिज़ार से

मिलता क़रार भीग के ही प्यार में सदा
भीगें हैं रूह-ओ-जिस्म सदा तेरे प्यार से

दुनिया में चीज़ हर नहीं होती बिकाऊ है
महरूम ज़िंदगी में हैं हम आज यार से
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर