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गुनाह के बाद

                
                                                         
                            ज़मीर क्यूँ नहीं दुखता, तेरा गुनाह के बाद
                                                                 
                            
गुज़र के जीते भी कैसे हो, क़त्ल-गाह के बाद

यूँ जुर्म करके, है मुश्किल नज़र उठाना भी तो
नज़र मिला नहीं सकते, ख़ुदा से चाह के बाद

उजाड़ कर किसी का चैन, सुख मिलेगा नहीं
खा-पी सकोगे न, कानों में पड़ती आह के बाद

ख़ुदा के दिल में जगह, जुर्म कर मिलेगी नहीं
सदा भटकना तुझे, जुर्म की पनाह के बाद

न तुम ज़मीर का अपने, करो यूँ सौदा कभी
है बोया काटना तुमको ग़लत सी राह के बाद
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2 महीने पहले

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