गुलाब इश्क़ का कबूल कर लो तुम मेरे सनम
ये दिल में इश्क़ मौन सा ही भर लो तुम मेरे सनम
न मुख से तो कभी भी कह सकेंगे हाल अपना हम
समझ सको तो दिल में कर ही घर लो तुम मेरे सनम
जहां ने सारे मुझको दुख ही तो दिया है आज तक
कभी तो प्यार से ये ग़म भी हर लो तुम मेरे सनम
ख़याल तेरा मुझको यारा रात दिन ही रहता है
महक सा बन के मुझमें यूँ बिखर लो तुम मेरे सनम
मेरे तो रोम-रोम में बसे हो ख़ुशबू बन के तुम
यूँ रूह में मेरी सदा उतर लो तुम मेरे सनम
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