सर को झुका कर हम खड़े हैं अब तिरे दरबार में
दरख़ास्त है के दूर कर दे कमियों को किरदार में
अनजाने में हमसे कभी हो जाए भी गर भूल तो
बच्चे हैं हम तेरे खड़े हैं माफ़ी के आसार में
राहें भटकने से ही पहले राह हमको तू दिखा
आ जाए हमको जीना मुश्किल वक़्त की रफ्तार में
सुख-दुख में हम करते रहे तेरा ही शुकराना सदा
तेरी ही रहमत की हो बारिश भी दर-ओ-दीवार में
'पारुल' का सर तेरे ही सजदे में सदा झुकता रहे
तुमको ही देखूँ ज़िंदगी भर हर-सू मैं दीदार में
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