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सोचा था साथ रहेंगे हम समंदर की तरह

                
                                                         
                            सोचा था साथ रहेंगे हम समंदर की तरह,
                                                                 
                            
तुमने मुझे बदल दिया पुराने कैलेंडर की तरह।

कहाँ रह गया है फ़र्क़ अब नूर-ओ-बेनूर में,
मेरे बाहर भी हो गया है मेरे अंदर की तरह।

मैं तो धुआँ हूँ, मेरा कोई वजूद कहाँ है,
तुम लगने लगे हो अब किसी पत्थर की तरह।

मैं रेशम नहीं हूँ कि लुभाऊँ बदन को,
मैं थोड़ा-थोड़ा चुभता हूँ खद्दर की तरह।

क़िस्मत में न था उम्र भर का साथ, फिर भी,
दोस्त बनकर मिलते रहेंगे मुक़द्दर की तरह।
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1 सप्ताह पहले

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