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"विस्मृति का उत्स एवं नव-अंकुर"

                
                                                         
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जो इतना भरा है—
क्या वह स्मृति है
या जड़ हो चुकी प्रतिध्वनि?
मैं कब से
ढो रहा हूँ
विचारों के मृत शरीर,
और उन्हें ही
अपना सत्य कहता आया हूँ।

जब तक
बीते हुए पदचाप
मन की सुरंगों में गूँजते रहेंगे,
मौन कहाँ उतरेगा?
सृजन
किसी उत्सव का कोलाहल नहीं—
वह तो
एक निर्वसन एकांत है,
जहाँ प्रवेश से पहले
स्मृतियों को
द्वार पर छोड़ना पड़ता है।

विस्मृति
रिक्त होना नहीं है।
वह तो
चेतना का
स्वयं पर किया गया
एक कठोर अनुग्रह है।
एक पवित्र विलोपन—
ताकि भीतर की भूमि पर
फिर उग सके
अनाम संभावनाओं का
पहला अंकुर।

पत्तियाँ
अपना हरापन भूले बिना
मिट्टी नहीं बनतीं।
और मिट्टी बने बिना
नवांकुर का जन्म नहीं होता।
मुझे भी
भूलना होगा
अपने अर्जित प्रकाश को,
ताकि देख सकूँ
उस दिशा को
जो अभी तक
अंधकार में साँस ले रही है।

हे मन,
तू इस विस्मरण से
इतना भयभीत क्यों है?
ढहना ही
शायद निर्माण का
प्रथम संस्कार है।
जब भीतर का पुराना आकाश टूटेगा,
तभी शून्य में
कोई नया रंग
अपनी पहली धड़कन सुनेगा।

अतः—
विस्मृति को
पराजय मत समझ।
वह अंत नहीं,
अंतों से परे
एक गहन आरंभ है।
पुराने सत्यों का कुहासा हटने दे—
क्योंकि
इसी अंतरतम रिक्ति से
कभी-कभी
सृजन का सूर्य जन्म लेता है।
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एक महीने पहले

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