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"विडंबना : साधुता का दंड"

                
                                                         
                            सरल रहा तो क्यों मुझको,
                                                                 
                            
हर आघात ही मिलता है?
क्या निष्कपट होना जग में,
इतना ही खलता है?

सीखा था जो विनय कभी,
क्या वह भ्रम का बोझ हुआ?
या मेरा झुकना ही फिर,
सबका सहज खोज हुआ?

सत्य चुना तो पथ ने ही,
काँटों का परिचय दिया।
या मेरे ही अंतर्मन ने,
हर घाव स्वीकार लिया?

मन की कोमल धरती पर,
घाव नहीं उगने थे।
फिर क्यों भीतर मौन अश्रु,
इतने गहरे जमे थे?

द्वंद्व टालकर सोचा था,
शांति कहीं मिल जाएगी।
पर स्वार्थों की इस बस्ती में,
साँस कहाँ बच पाएगी?

क्या सद्भाव आज केवल,
निर्बलता कहलाता है?
या मेरा ही विश्वास अभी,
मुझको भरमाता है?

मैं ही शायद भूल रहा,
जग का अपना व्याकरण।
जहाँ सरलता पढ़ी जाती,
अक्सर केवल समर्पण।

फिर भी एक प्रश्न बचा—
क्या मैं भी बदल जाऊँ?
या भीतर के निर्मल जल को,
स्वयं विषैला बनाऊँ?

नहीं, यही अंतिम उत्तर—
मन अपना दूषित न हो।
यदि जग अंधकार चुने भी,
मुझमें दीपक क्षीण न हो।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 सप्ताह पहले

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