कोमल पर क्यों आराधन-भार?
मानव ने वरा उपयोग-सार।
तुमने जिसे देवी माना,
पलकों पर था सांध्य-बहाना;
पर अंतर में अग्नि-व्रत ढाला,
नियति का कैसा खेल निकाला!
वह वन-पथ की आकुल पुकार,
चरणों में रख युग का विकार।
सरिता का नीलिम पावन श्वास,
तम-कण से किया तुमने विनाश।
तरुवर थे वसुधा के गान,
उत्सव ने हर लिए परान।
क्यों सुकुमार सत्ता पर ही,
मढ़ा आराधना का यह भार?
मानव ने तो स्वार्थ-तुला पर,
सदा तौला है यह संसार!
देवी कह उच्चासन दिया,
पलकों की संध्या को छीना;
सौंप दी विवश अग्नि-वेला,
यह कैसा निष्ठुर खेल खेला!
चरणों में युग की परिभाषा,
कुचल दी वन की सहज आकांक्षा।
नदियों के पावन नीलिम उर में,
घोल दिया तमस तुमने पल में।
मौन तपस्वी तरुवर जागे,
उत्सव के सुर में प्राण भागे।
ओ मनुज! सृष्टि को मिथक बना,
क्यों स्वार्थ-अंधड़ में रहा सना?
क्यों कोमल पर रीता भार?
मानव का उपयोग-श्रृंगार!
पलकें थीं सजल-सकाम जहाँ,
जलती अग्नि का वास वहाँ।
वह मेघ-सिक्त वन की श्वास,
तुमने बाँधा सीमा का पाश।
नीलम-सी बहती थीं तरंग,
तम-कण से धूमिल किया रंग।
मौन तपस्वी तरुवर म्लान,
उत्सव ने फूँके सबके प्राण।
हे मनुज! न दो मिथक-विराम,
यदि प्रेम सत्य का है नाम—
तो इतना अवकाश रहे,
जो जैसा है, वैसा ही बहे॥
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X