ज़िंदगी अपनी रही,
अपनी ही रफ़्तार।
संभ्रम से भीगा मन,
तरसे सच्चे प्यार।
मिलते सब राहों में,
मिलन हुआ दुर्लभ।
होंठों पर मुस्कान,
हृदय रहा निःशब्द।
अहं के ऊँचे शिखर,
छूते रहे गगन।
रिश्तों की कोमल डोर,
होती गई क्षीण।
शब्द हुए औपचारिक,
भाव हुए निर्वास।
अपने ही दर्पण से,
होता रहा संवाद।
प्रेम न माँगे मान,
न चाहे सम्मान।
झुकने वाला मन ही,
पाता है पहचान।
मन से मिटा कलुष,
टूटा मौन प्रहार।
प्रेम जहाँ जीवित रहा,
वहीं सच्चा संसार।
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