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"प्रस्थान के बाद : एक आंतरिक जिरह"

                
                                                         
                            उसके जाने के बाद
                                                                 
                            
सबसे अधिक शोर
मेरी शिकायतों का था।
पर उसी शोर के भीतर
एक धीमा प्रश्न जागा—
क्या सचमुच मैंने उसे
उतना ही समझा था
जितना अपने प्रेम को समझता रहा?

स्मृतियों में लौटकर देखा
तो पाया,
जहाँ मुझे अपना समर्पण दिखता था,
वहाँ कई बार
मेरा अहं ही उपस्थित था।
मैं निकट तो था,
पर क्या उसके अकेलेपन तक
पहुँच पाया था?

विश्वास शब्दों से नहीं,
उन क्षणों से बनता है
जब कोई अपना मन खोलकर
तुम्हारे सामने रख देता है।
अब सोचता हूँ—
क्या मैंने उसकी निस्संग पीड़ा को
सुनने का धैर्य रखा था?

मन बड़ा चतुर है।
वह हर विफलता में
अपने पक्ष के प्रमाण खोज लेता है,
पर आत्मा के सामने
कोई तर्क नहीं टिकता।
वह चुपचाप बता देती है
कि कहाँ हम सच थे
और कहाँ केवल स्वयं के पक्षधर।

संभव है
मैंने कुछ अवसरों पर
प्रेम से अधिक
अपनी सुविधाओं को चुना हो,
और यह भी संभव है
कि कुछ दूरियाँ
सारे प्रयत्नों के बाद भी
नियति की तरह घटित होती हों।

अब न उसे दोष देना है,
न स्वयं को निर्दोष ठहराना।
मुझे केवल इतना करना है—
अपने हिस्से की भूलों को स्वीकारना,
अपने हिस्से की निष्ठा को पहचानना,
और उस रिक्तता के सामने
शांत खड़ा रहना,
जहाँ कभी एक संबंध था,
और जहाँ आज
मेरा सबसे सच्चा परिचय
मुझसे ही हो रहा है।
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4 घंटे पहले

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