सुख का स्रोत न मापा जाए
संचित स्वर्ण-भंडारों से;
वह तो चुपचाप खिल उठता
मन के निर्मल द्वारों से।
थोड़ा यदि अपनापन हो,
थोड़ी कृतज्ञ दृष्टि रहे;
सूनी मुट्ठी भी जीवन की
पूर्ण धरोहर-सी लगे।
इच्छाओं के अनगिन मेघ
जब अंतर से छँट जाते;
संतोष के श्वेत प्रभात
निश्शब्द स्वयं उग आते।
पूर्ण वही, जो हर अभाव
में भी अवसर पढ़ लेता;
एक कण में सागर का
अमिट विस्तार गढ़ लेता।
धन का वैभव क्षणभंगुर,
मन का वैभव चिरजीवी;
कृतज्ञ हृदय के सम्मुख
फीकी हर उपलब्धि रही।
जीवन का अनुपम उत्सव
संचय में कब बसता है?
जो थोड़ा है, उसी में ही
अनन्त स्वयं हँसता है।
वही धनी, वही संपन्न—
जिसने संतोष साध लिया।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X