अक्सर
अनिवार्य हो जाता है
परिधानों के पीछे छिप जाना,
ताकि अक्षुण्ण रह सके
अंतस का वह आदिम,
नितांत वैयक्तिक स्पंदन,
जिसे दृष्टि नहीं,
केवल आत्मा पहचानती है।
किन्तु—
चेतना के ये वातायन
अत्यंत झीने हैं,
सूत-सूत पारदर्शी।
संसार का कोलाहल
अनायास ही
इनकी देहरी लाँघ आता है।
वह मान लेता है—
जो मुख पर है,
जो सहज है,
जो अनावृत है,
जो मंदस्मित है—
वही संपूर्ण सत्य है।
पर शब्दों के विग्रह से परे,
मौन के उस अगम प्रदेश में,
जहाँ कोई गवाक्ष नहीं खुलता,
कोई प्रतिध्वनि नहीं लौटती,
वहाँ
एक अजस्र, अनुच्चारित पीड़ा
निरंतर स्वयं को जीती रहती है।
वह किसी भाषा का वाक्य नहीं,
किसी इतिहास का अभिलेख नहीं;
वह तो
स्मृति से भी प्राचीन
और समय से भी अधिक एकाकी
एक ऐसी विस्मृत सूक्ति है,
जिसे यह व्यवस्था
न पढ़ सकती है,
न समझ सकती है।
वही—
मेरे समस्त उच्चारित शब्दों के पीछे
अनकहा अर्थ है;
मेरे प्रत्येक मौन के भीतर
धड़कता हुआ सत्य।
वही
मेरे होने का
सभी भारतवासियों में भारत मां हैं।
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