मैंने कई बार
अपने भीतर उठते धुएँ को
आकाश समझने की भूल की है,
और क्षणिक छायाओं को
अपने अस्तित्व का अंतिम सत्य।
जब भी किसी अदृश्य पीड़ा ने
मेरे कंधों पर अपना हाथ रखा,
मैंने पाया—
दुःख उतना भारी नहीं था
जितना उसके प्रति मेरा मोह।
मेरे भीतर एक प्रदेश है
जहाँ कटुताएँ बीज की तरह गिरती हैं,
और यदि मैं उन्हें सींच दूँ,
तो वे वृक्ष नहीं,
अंधकार की दीवारें बन जाती हैं।
किन्तु कौन जानता है—
इन सबके परे कोई प्रकाश है भी या नहीं?
मैं केवल इतना जानता हूँ कि
जब मैं अपने घावों से बाहर निकलता हूँ,
तो श्वास कुछ अधिक निर्मल हो जाती है।
प्रतिशोध की अग्नि में झाँककर देखा है मैंने,
वहाँ शत्रु का चेहरा नहीं,
अपनी ही आकृति विकृत हो दिखाई देती है;
और आत्म-दया के सरोवर में
प्रतिबिम्ब भी धीरे-धीरे डूबने लगता है।
इसलिए अब मैं
न तो मेघों से युद्ध करता हूँ,
न उन्हें अपना आकाश मानता हूँ।
मैं बस चलता हूँ—
उस अज्ञात दिशा की ओर
जहाँ करुणा प्रश्न है,
और जीवन स्वयं उसका मौन उत्तर।
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