मैं स्वयं को एक शिखर समझता रहा,
धूल और शून्य के बीच खड़ा।
पर क्या ऊँचाई ही दिशा होती है?
या यह केवल
अपने ही विस्तार का भ्रम है?
मैं आकाश से प्रश्न करता हूँ—
और लौट आती है
मेरी ही आवाज़।
मेरे हाथ उठे हैं
मानो किसी को बुला रहे हों,
किन्तु शायद
वे भीतर के भय की आकृतियाँ हैं।
इस सूनी भूमि पर
कोई पदचिह्न नहीं,
सिवाय मेरे।
क्या नेतृत्व संभव है,
जब पीछे केवल एकांत हो?
शायद मैं पथ-प्रदर्शक नहीं,
केवल एक यात्री हूँ,
जो अपने ही वृत्त में चलता रहता है।
मैं ही प्रश्न हूँ,
मैं ही प्रतीक्षा।
यह यात्रा कहीं नहीं पहुँचती—
फिर भी समाप्त नहीं होती।
मैं एक पुराना ग्रंथ खोलता हूँ।
शब्द अब भी वहीं हैं,
पर अर्थ जैसे मर चुके हों।
ज्ञान—
क्या वह सचमुच प्रकाश है?
या अंधकार को सहने की
एक प्राचीन युक्ति?
पृष्ठ मौन हैं,
और मौन अधिक सत्य लगता है।
इस अथाह विस्मृति के सम्मुख
मेरा अहं,
मेरी महत्त्वाकांक्षाएँ,
धीरे-धीरे धूल हो जाती हैं।
मैं कोई दिशा नहीं,
केवल एक भटकन हूँ—
जो स्वयं को खोजते-खोजते
स्वयं से ही दूर चला आया है।
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