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"दृष्टि के उस पार"

                
                                                         
                            समय के हाथों में
                                                                 
                            
सुख और दुःख के अनेक रूप हैं।
वे आते हैं, चले जाते हैं,
पर मैं सोचता हूँ—
क्या जीवन उनका नाम है,
या उन्हें देखने वाली दृष्टि का?

कभी सफलता मुझे ऊँचा करती है,
कभी विफलता झुका देती है।
तब भीतर से स्वर उठता है—
क्या मैं परिस्थितियों का प्रतिबिंब हूँ,
या उनसे परे कोई मौन साक्षी?

घटनाएँ द्वार पर आती हैं,
कुछ प्रकाश रख जाती हैं,
कुछ अंधकार।
पर उनके जाने के बाद
मेरे भीतर क्या शेष रहता है—
यही प्रश्न सबसे बड़ा है।

एक ही वर्षा
किसी के लिए उत्सव है,
किसी के लिए उदासी।
तब लगता है,
संसार बाहर नहीं बदलता,
दृष्टि बदलती है।

किन्तु मैं आश्वस्त नहीं।
जो मैं सत्य समझता हूँ,
वह भी मेरी सीमा हो सकती है।
शायद मेरा विवेक भी
अपूर्णता का ही
एक सुसंस्कृत रूप हो।

जब जीवन कठोर होता है,
तब दो ही मार्ग बचते हैं—
या तो टूट जाना,
या अर्थ की खोज करना।
मैं दूसरे मार्ग की धूल
अपने चरणों पर महसूस करता हूँ।

धीरे-धीरे समझा हूँ,
बाधाएँ विरोधी नहीं होतीं।
वे भीतर छिपे स्वरूप को
उकेरने वाली छेनी हैं।
पीड़ा नष्ट कम करती है,
प्रकट अधिक करती है।

अब उत्तरों की नहीं,
प्रश्नों की संगति प्रिय है।
उनके बीच कहीं
एक सूक्ष्म आलोक जलता है—
मानो चेतना कह रही हो,
दृष्टि को पहचानो,
अर्थ स्वयं प्रकट होगा।
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एक घंटा पहले

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