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"भीतर के आकाश की ओर"

                
                                                         
                            मैं खोजता रहा
                                                                 
                            
उन शब्दों को
जो मुझे पूर्ण बना दें,
पर हर उत्तर के पीछे
एक और प्रश्न खड़ा था—
मौन और अधिक गहरा।

किसी ने मेरे पात्र को
विचारों से भर देना चाहा,
पर भरा हुआ पात्र
आकाश नहीं देख पाता।
ज्ञान का भार कभी-कभी
पंखों की स्मृति छीन लेता है।

फिर किसी ने
कुछ सिखाया नहीं,
केवल इतना कहा—
"स्वयं को सुनो।"
और मैंने पहली बार जाना
कि दिशा बाहर नहीं जन्मती।

मेरे भीतर ही कहीं
एक अप्रयुक्त प्रकाश था,
जो स्वीकृति नहीं माँगता था।
वह प्रतीक्षा में था
कि मैं अपनी ही शंकाओं के द्वार से
गुज़रने का साहस करूँ।

तब समझ में आया—
मार्ग दिखा देना पर्याप्त नहीं,
चलने की आकांक्षा जगाना आवश्यक है।
दीपक का प्रयोजन
अपने प्रकाश का प्रदर्शन नहीं,
अंधकार को अप्रासंगिक कर देना है।

अब भी नहीं जानता
अंतिम सत्य क्या है,
कौन-सी सत्ता इस यात्रा की साक्षी है।
किन्तु इतना अनुभव करता हूँ—
जो मुझे मेरे भीतर लौटा दे,
वही गुरु है, वही आकाश है।
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एक महीने पहले

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