शब्दों के सीमित बंधनों में,
बँधता यह अनुराग नहीं।
अंतस-वीणा की मौन तान है,
कोई विस्मृत राग नहीं।
मरु-मन की शुष्क व्यथाओं से,
जब चेतन आहत होता है।
युगों-युगों की दूरियाँ तब,
मौन आवरण बुनता है।
टूटे जब विश्वास-दर्पण,
मौन स्वयं सिसकाता है।
बिखरा पावन भाव-अर्पण,
मन को रिक्त बनाता है।
परनिंदा की धूमिल छाया,
निर्मल रश्मि हर लेती है।
अपेक्षाओं की दाह भीतर,
स्नेह-सरित सुखा देती है।
परिवर्तन की व्याकुलता में,
कोमल कलियाँ झर जातीं।
भाव-सरोवर मथ जाता है,
सद्भाव-तरंगें थम जातीं।
किन्तु चेतना अंतर्मुख हो,
जब निज दीप जलाती है।
मौन प्रार्थना का आलोक,
विश्वास नया जगाती है।
शुभता जब निःशब्द उतरती,
हर अनाम की साँसों में।
रोदन भी मुस्का उठता है,
समर्पण की सुवासों में।
जो सहस्र शब्द कह न सके,
अश्रु सहज कह जाता है।
जड़ से जड़ मन भी पिघलकर,
करुणा में बह जाता है।
जय-पराजय से ऊपर उठ,
संबंधों को सींचो तुम।
जहाँ दुआ की गंध बसती,
वहाँ अमर होते हैं सुमन।
अवसाद स्वयं विलीन वहाँ,
जागे जीवन-गीत नया।
ऊर्जा का निःस्वार्थ समर्पण,
रच दे फिर संगीत नया।
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