खिड़कियाँ जो मौन ठहरीं,
उन पर दस्तक व्यर्थ है;
जहाँ प्रतिध्वनि भी थक गई हो,
वहाँ प्रतीक्षा केवल अनर्थ है।
स्मृतियों के जर्जर अवशेषों में
अब किसे पुकारूँ मैं?
स्वयं की आदिम आहट ही
मेरे होने का अंतिम प्रमाण है।
जिन्होंने समय का पृष्ठ पलटकर
मुझे अतीत में छोड़ दिया,
उनके रिक्त अध्यायों में लौटना
अपने ही शून्य का परिभ्रमण है।
याचना के करों में जो मिला,
उसे अनुराग कैसे कहूँ?
प्रेम तो वह निःशब्द निर्झर है,
जो आत्मा की शिराओं में बहता है।
उपेक्षा की शीत देहरी पर
हर क्षण झरती ऊर्जा ने
सिखा दिया—
आत्मगौरव का क्षय
सबसे मूक पराजय है।
परायी गलियों के कुहासे से
अब लौट आया हूँ।
मुख्य पथ की धूल भी
पराधीन उजालों से अधिक पवित्र है।
जो आत्मा का मूल्य न पहचान सके,
उन्हें प्रमाण देना
स्वयं को कटघरे में खड़ा करना है;
मौन ही वहाँ अंतिम उत्तर है।
जीवन किसी ठहरे दीप का नाम नहीं,
वह तो निरंतर प्रवहमान अग्नि है।
अब निष्प्रयोजन लौ के सम्मोहन में
एक क्षण भी ठहरना स्वीकार नहीं।
अब स्वयं की अग्नि में तपना है,
स्वयं का ही धातु बनकर।
क्योंकि मनुष्य की अंतिम यात्रा
किसी और तक नहीं—
अपने ही शिखर तक होती है।
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