घर में बड़ा नहीं कोई,
तो पौ बारह हो गई,
चमक उठे सितारे,
सब खुली खुली बातें हो गईं।
ना घर चिंता, ना बाहर चिंता,
पूरी आजादी मिल गई।
ना कोई कहने वाला,
ना कोई सुनने वाला,
अब तो मनमानी बढ़ गई।
जो बंदिशें लगी थीं,
वो बंदिशें हट गईं।
अब है फुल आजादी,
पिंजरे से रिहाई हो गई।
-चंद्र दत्त शर्मा
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