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ग़ज़ल

                
                                                         
                            चिंगारी गर फूस पे गिरे, वो शोला बन जाता है |
                                                                 
                            
इक घर ही नहीं, हर ख़्वाब भी राख बन जाता है ||
जो जाते हैं, फिर मुड़कर कभी लौटा नहीं करते |
अंधेरों में बहता हर अश्क भी दाग़ बन जाता है ||
शिकवा किससे करें, जब अपने ही ज़ख्म दे जाएं |
अपनों का हर लहज़ा भी खंजर बन जाता है ||
हर चेहरा मुस्कुराता है, ये नकाब भी लाजिमी है |
यहां सच बोलने वाला भी तमाशा बन जाता है ||
रिश्ते जब वक्त की आंधी में बिखरने लगते हैं |
हर लफ्ज़ होंठों तक आकर सुकूत बन जाता है ||
अब आईना भी मुझसे आंख मिलाने से कतराता है |
हर अक्स मेरी ख़ामोशी का गवाह बन जाता है ||
'सनेही' गम सहकर भी, कभी शिकवा नहीं करता |
दर्द हद से गुजर जाए, वही ग़ज़ल बन जाता है ||
0पी. एन. शर्मा ' सनेही '
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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