शायरों ने की शायरी रानाई-ए-कौनैन पर,
नादान मैं तुझ पर ही ग़ज़ल कहता रह गया।
ज़िंदगी दौड़ती रही ज़माने के साथ-साथ,
एक मेरा दिल था जो तेरी राहों में बह गया।
तूने सजाई महफ़िलें हमेशा गैरों के साथ,
मैं शम्अ-ए-आरजू ही रोशन करता रह गया।
दुनिया बदल गई मगर बदला न मेरा दिल,
तेरी यादों का साया ही मेरे दिल में रह गया।
वक़्त के साथ जो चले मंज़िल मिली उन्हें,
तूने छोड़ा था जहां'ओम'मैं वहां ही रह गया।
रानाई ए कौनैन : पूरी कायनात की सुंदरता।
-ओम गोपाल शर्मा
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