उस फ़ोन की काली सिल पर जब अपना चेहरा देखा,
जैसे लगा फ़ोन अपना होगा, लेकिन किसको पता यह कैसा होगा?
जब छोटे जानो को फ़ोन पकड़े देखता हूँ मैं,
लगता ऐसा कि अपनी ही टहनियों पर कुल्हाड़ी मारते हैं वो!
वो दौर थोड़ा मनोरंजन होता, फिर पूरे दिन वबंडर होता,
कबीर की उस रीत का आज साफ़ अंतर दिखता, जैसे
"कल करे सो कल कर, आज करे सो परसों"... वही हर रोज़ मंतर होता!
मम्मी-पापा भी फटकारते लेकिन आज वही नहीं मानते, शाय़द उस काली लत, की तड़प को आज वे स्वीकारते।
दौर जो जाएगा ऊपर-ऊपर, रात होएगी तीतर-बीतर,
फिर समझ नहीं आएगा, जो आज दिमाग़ से जाएगा
कहता हूँ मैं कहना मानो, दौर वही जो आएगा...
जो मेहनत और बुद्धि के बल पर, पूरी दुनिया में छाएगा!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X