*बाट निहारूंँ आओ प्रियतम सावन में*
बाट निहारूंँ आओ प्रियतम सावन में ।।
क्यों भूल गए वो सारे कसमें वादे,
जो किए कभी थे हमसे पहली रातन में ।।
बाट निहारूंँ आओ प्रियतम सावन में ।।
सपने सारे बिखर गए हैं सुन साजन,
आंँसू बहते दिन रात सुनो इन आंँखन में ।
पति धर्म निभाया तूने कैसा प्रियतम,
दर्द विरह का दिखता सबको आनन में ।।
बाट निहारूंँ आओ प्रियतम सावन में ।।
अब हाल सुनाऊंँ मैं अपना किसको बोलो,
हूक उठे है मेरे दिल के कानन में ।
अब तेरी याद हिलोरा मार रही है,
यादों की पाती लिख भेजूंँ सावन में ।।
बाट निहारूंँ आओ प्रियतम सावन में ।।
सावन की रिमझिम बूंँदों के जैसे अब,
प्रिय आकर खुशियांँ बरसाओ आंगन में ।
तेरी बांँहों में आकर हे प्रीत सुनो,
सुंदर से दो फूल खिलेंगे दामन में ।।
बाट निहारूंँ आओ प्रियतम सावन में ।।
-नीलम अग्रवाल "रत्न"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X