पंख खोले जीवन की तलाश में
आकाश में ऊंची उड़ान के लिए
निकले नीड़ को छोड़कर पक्षीं,
दबे मलवे के बीच ले रहे हैं, अंतिम सांसें
जिस महल में दबकर वह मर रहे हैं पल-पल
वहाँ वह नए जीवन की तलाश में आए थे ।
आज वह बनते जा रहे हैं लाश
वही जो कई संपने लेकर आए थे
वह छटपटा रहे हैं
फड़फड़ा रहे हैं अपने पंख
निगल गया है यह लोभी संसार उन नादानों को
जिन्होंने नवयौवन में कदम रखा था।
रंग दिए जाएंगे यह घोंसले कुछ दिनों में
भूल जाएंगी सरकारे चंद दिनों में
सवाल, मुद्दे, मृत्यु और मनुष्य को भूल जाना तो
सरकारों, जमीदारों, ठेकेदारों की पुरानी परंपरा है।
पर उनका क्या जिनके घरों का
आखिरी चिराग बुझ गया है
अब उन घरों में कभी दिये नहीं जलाए जाएंगे
उनमें छाई रहेगी आजीवन उदासी
जब भी देखेंगे किसी को दिल्ली की तरफ जाते हुए
उन्हें अपने नादानों की याद आएगी।
-निकिता यादव 'ओम्श'
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