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जीवन का असमंजस

                
                                                         
                            अर्ज किया है कि
                                                                 
                            
कड़वा है पर सत्य है
अपना हो या पराया
लोग अपने सुख दुख एक दूसरे से बांटा करते है
और बाद में स्वयं के सुख दुख के असमंजस में फँस जाया करते है
लेकिन सच तो यह है कि दूसरे आपसे घृणा नही केवल स्वयं से थोड़ा अधिक प्रेम करते है
जिस प्रकार चन्द्रमा केवल अंधेरे में ही चमकता है
उसी प्रकार यदि लोगों से प्रेम चाहिए तो सुख दुख से अधिक
दिल मे समर्पण का भाव रखना होगा
समर्पण करने के लिए उन सब की कठोरता को शिक्षक की भांति स्वीकार करना होगा
और हो अगर जीवन मे सुख से यदि प्रेम तो आपको अपना कोई लक्ष्य बनाना होगा
जिस तरह सुर्य को किसी का प्रकाश नही चाहिए
लक्ष्य साधने वाले को किसी का आदेश नही चाहिए
तपती गर्मी में मेहनत भला किसको अच्छी लगती है ,लोग आपकी तरक्की को ईर्ष्या की दृष्टि से देखेंगे
और आपके लक्ष्य की योजना जानकर लोग आपसे प्रतिस्पर्धा करेंगे
प्रतिस्पर्धा के लिए आत्मविश्वास चाहिए
और आत्मविश्वास तो वही जहाँ प्रेम या समर्पण का कोई स्थान नही
आप कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े है
यदि आपमें आत्मविश्वास है तो लोग सम्मान देंगे नही तो आपका अपमान करेंगे
जीवन की इस असमंजस से यदि आपको दूर रहना हो तो याद रखना
अगर हो लोगो के लिए बहुत प्रेम तो प्रेम न मिलने पर अपनी अच्छाइयों को मत त्यागना
अंधेरे की बुराई को टालने वाले चंद्रमा की तरह चमकते रहना
और जब लक्ष्य साधना हो तो सुर्य की भांति किसी का इंतजार मत करना
--निधि राठौड़
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एक महीने पहले

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