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क्या मान लिया, क्या ठान लिया

                
                                                         
                            हार तब होती है,
                                                                 
                            
जब मन हार मान लेता है।
जीत तब होती है,
जब संकल्प अटल हो जाता है।
फ़र्क बस इतना सा है
क्या मान लिया और क्या ठान लिया।

रास्ते कभी खत्म नहीं होते,
बस हिम्मत थकने लगती है।
तूफ़ान भी अपना रुख मोड़ लेते हैं,
जब ज़िद आगे बढ़ने लगती है।

अंधेरों से डरकर पाँव रुकते नहीं,
जो जुगनू बनकर खुद जलना जानते हैं।
वो अक्सर छू लेते हैं आसमानों को,
जो ज़मीन पर रहकर भी उड़ना जानते हैं।

लकीरें हाथों की मोहताज़ नहीं होतीं,
तक़दीर तो पसीने से लिखी जाती है।
इतिहास वही रचते हैं दुनिया में,
जिनकी सोच सीमाओं से परे जाती है।

तो उठो, गिरो और फिर संभल जाओ,
यह सफ़र तुम्हारा है, इसे पूरा करके दिखाओ।
सुनो 'निधि', बात बस इतनी सी है
क्या छोड़ दिया, और क्या जोड़ लिया।
- निधि
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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