चार दिन की जिन्दगी
चार दिन की जिन्दगी, चार दिन के मेले हैं।
जिन्दगी में
जो आए थे अकेले तो जाना भी अकेले है।
सजाlए जिन्दगी की काट कर
जहाँ से आए थे, वहीं पर चले जाना है।
बस
अपने कर्मों की गठरी साथ ले जाना हैं।
बाकी तो सब कुछ यही पे रह जाना हैं।
फिर हम जो आए थे,
खाली हाथ तो खाली हाथ ही जाना है।
मत करो ये लड़ाई झगड़े और अभिमान।
ये सब कुछ यही दफन हो जाएंगे,
और रह जाएंगे ये जमीन और आसमान।
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