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हवा बदल रहा था वो,हवा ने ही रुख बदल लिया।

                
                                                         
                            आपने शुरू से ही उसे मान लिया था छोटा भीम।
                                                                 
                            
सड़के जली तब जाना क्या होती है इकोसिस्टीम।
पहले बागड़ोर होती थी जिम्मेदार हाथों मे सिर्फ,
आजकल लोकतंत्र को हांक रहे है रील या मीम।
ये 'श्रद्धा' लहूलुहान कर रही है देखो विश्वास को,
हुस्न करता है शिकार दिखाकर जन्नत-उन-नईम।
मुंसिफों की नब्ज टटोल ली है वतन फरामोशोंने,
अदालती दांवपेंचों मे बड़ी माहिर गद्दारों की टीम।
लंबे अर्से से यही लाचारी है कि ये गद्दार वो गद्दार,
फिर अब तो बंद ही कर दो लाचार सरकारी जिम।
हवा बदल रहा था वो ,हवा ने ही रुख बदल लिया,
वो नफ़ासत नहीं उसकी जुबां मे जो बदले रेजीम
-जयंत दिक्षित
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10 घंटे पहले

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