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नया बारूदी संस्करण है,ये सोशल मीडिया।

                
                                                         
                            अक्सर देता रहता है वो गीदड़ -भभकियां।
                                                                 
                            
पर कभी सुनता नहीं अपनी ही सिसकियां।
चंद सरफिरे फैसलों की तामील का ये हश्र,
दुनियाभर के मुल्क होने लगे है दिवालिया।
फोलोवर्स लाखों मगर आत्महत्या कर रहे,
भीड़ में भी तनहा है, इंफ्लूएंसर जिंदगियां।
एक अफ़वाह, पूरा शहर आतिश-आलूद है,
नया बारूदी संस्करण है,ये सोशल मीडिया।
कभी ये चोरी,कभी वो,कभी मुद्दों की चोरी,
सुबूत दो,फ़ुज़ूल-गोई सुनती नहीं ये दुनिया।
-जयंत दिक्षित
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3 सप्ताह पहले

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