कोसने दो, उसके कोसने से क्या होगा।
ये मत सोचो कि यू सोचने से क्या होगा।
वो भी मंझा हुआ है,वोभी ये जानता है,
इस विधायिका को रोकने से क्या होगा।
इमारतें गिरती है,फिर सरकारें चलती है,
चंद भ्रष्ट बाबुओं को दोषने से क्या होगा।
कौरवों ने हार का मर्म नहीं समझा कभी,
कृष्ण के माथे कलंक पोतने से क्या होगा।
बेमानी तुम्हारा हरेक वार,हर घाव निकला।
तुम हिलाते रहे,वो अंगद का पांव निकला।
कुछ किया भी नहीं , कुछ करने नहीं देता,
जहां कही मुँह खोला , काँव काँव निकला।
हुक्मरानों ने अवाम का ख़ूब इलाज़ किया,
डेंगू की दवा पहुंची, हैजे का गांव निकला।
बेवजह बस्ती में काटते फिर रहे कुत्तों की,
जांच में नेता का 'दिमागी ' प्रभाव निकला।
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