आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तुम ग़ज़ल बन गई

                
                                                         
                            तुम ग़ज़ल बन गई
                                                                 
                            
रात में जब जुगनू देखा,
तो तुम्हारी याद आई,
उसकी रोशनी में
तुम्हारी मुस्कान नज़र आई।
जब तुम आईं,
तो किसी की कही हुई बात याद आई,
फिर न जाने क्यों
हर बात तुम्हीं तक आ गई।
समय ने यूँ करवट बदली,
कि इंतज़ार मेरी नज़्म बन गया,
तुम मेरी ग़ज़ल बन गईं,
और मेरा दिल तुम्हारा अल्फ़ाज़ बन गया।
अब साथ हो तुम दोनों
मेरी ज़िंदगी में,
तो मेरी हर कविता
एक मुकम्मल ग़ज़ल बन गई।
-नीलम चौरसिया “नील”
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
16 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर