येह फ़िजूल की ख़ाहिशें बेकार के अरमाँ क्यूँ हैं
हर इक इन्सान यहाँ तसव्वुर ही में परेशाँ क्यूँ है!
हांफती हवाओं से कांपती हैं टहनियां शजर की
बारिश न बिजली बादलों से भरा आस्माँ क्यूँ है!
हर तरफ़ हर मंज़र है परेशान येह माजरा क्या है
इन्सान को देखकर इन्सान इस क़दर हैरां क्यूँ है!
आखिर ये मुसाफ़िरत है कैसी येह सफ़र है कैसा
ठहरा हुआ सहरा में ख़्वाहिशों का कारवाँ क्यूँ है!
हरसू धुआँ धुआँ हर समां धुआँ धुआं हुआ क्यूँ है
मन के आंगन पे झुका आस्माँ धुआँ धुआँ क्यूँ है!
-एन. आर. कस्वाँ
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