गर्द-ओ-गुबार का चल पड़ा है काफ़िला मेरे पीछे ऐसे
अकेला ही मैं हो गया हूँ कारवाँ अपने सफ़र का जैसे!
किसी मोड़पे बैठे रहते किसीके साथके मुंतज़िर अगर
तो होती हम को हासिल अपनी मंज़िले- मक़्सूद कैसे!
-एन आर कस्वाँ
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